तुरतुक तक पहुंचना आसान नहीं है. यह छोटा गांव उत्तर भारत के लद्दाख क्षेत्र की नुब्रा घाटी में सबसे दूर स्थित है.
इसके एक तरफ श्योक नदी बहती है और दूसरी तरफ कराकोरम पर्वत श्रृंखला की ऊंची चोटियां हैं.
तुरतुक तक जाने और वहां से आने का केवल एक ही रास्ता है. एक उबड़-खाबड़ सड़क लेह के पहाड़ी दर्रों से गुजरती हुई यहां तक पहुंचती है.
हिचकोले खिलाती सड़क के दोनों तरफ मनोरम दृश्यों की भरमार है. लेकिन उससे भी दिलचस्प है यहां का इतिहास. तुरतुक एक ऐसा गांव है जिसने अपना देश खो दिया है.
लद्दाख का बाकी हिस्सा बौद्ध है, जहां लद्दाखी तिब्बती रहते हैं, लेकिन तुरतुक एक बाल्टी गांव है.
बाल्टी तक नस्लीय समूह है जिनके पूर्वज तिब्बती थे और जो अब मुख्य रूप से पाकिस्तान के स्कर्दू इलाके में रहते हैं.
यहां के गांव वाले नूरबख्शिया मुसलमान हैं, जो इस्लाम की सूफी परंपरा का हिस्सा है. वे बाल्टी भाषा बोलते हैं, जो मूल रूप से एक तिब्बती भाषा है.
गांव के लोग सलवार कमीज पहनते हैं. इनके अलावा उनकी और भी कई चीज़ें बाल्टिस्तान में रहने वाले अपने कुनबे के लोगों से मिलती-जुलती हैं.
नियंत्रण रेखा से 6 किलोमीटर आगे पाकिस्तान की तरफ जाने पर उनकी बस्तियां हैं.
1947 की जंग के बाद तुरतुक पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया था लेकिन 1971 की लड़ाई में भारत ने इसे फिर से हासिल कर लिया.
1971 की जंग की उस रात इस गांव के जो लोग अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने गए थे या कहीं और काम करने गए थे, वे वापस अपने घर कभी नहीं लौट पाए. तब से यहां भारत का नियंत्रण है.
यहां के सरहदी इलाके पिछले कई दशकों से शांत हैं और 2010 में तुरतुक को सैलानियों के लिए भी खोल दिया गया है.
सैलानी यहां सैर-सपाटे के लिए आ सकते हैं और यहां के लोगों के रहन-सहन और ज़िंदगी जीने के उनके तरीके को करीब से देख सकते हैं.
बाल्टी लोग कराकोरम के पत्थरों से दीवारें बनाते हैं. उनके घर और चारदीवारियां भी पत्थरों से ही बनी हैं. यहां तक कि खेतों की सिंचाई के लिए नालियां भी पत्थरों से बनाई गई हैं.
No comments:
Post a Comment