कुछ उर्दू/ हिन्दुस्तानी अलफ़ाज़ हों, कहीं ख़ुदा, रब या अल्लाह जैसे शब्द आ जायें और लिखने वाले को इक़बाल कहते हों तो कुछ लोगों के कान खड़े होने के लिए इतना काफ़ी है.
उनके लिए शब्दों के भेद जानना अहम नहीं है. उनके ज़हन में शब्दों से निकलने वाली आवाज़ों की छवियाँ हैं. उन छवियों में कोई धर्म है. उस धर्म की ख़ास छवि है.
वही छवि उनके लिए असल मायने है.
फिर चाहे, हम कितनी भी मानेख़ेज़ बात कहें, लिखें या बोलें, वे उन्हें उन छवियों से ही तौल देते हैं. सिरे से ख़ारिज करने की भरपूर कोशिश करते हैं. इस कोशिश में वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि 'भारत' शब्द से बनने वाली तस्वीर को ही तोड़ने लगते हैं.
अगर हम वाक़ई में देखना चाहते हैं तो हाल के दिनों में ऐसा बहुत कुछ दिख सकता है. ताजा मामला एक नज़्म के सिलसिले में हैं. नज़्म लिखने वाले ने इसे 'बच्चे की दुआ' नाम दिया था. यही दुआ अरसे से भारत के कई हिस्सों में उर्दू और हिन्दी में पढ़ाई जाती है.
अब आपत्ति दर्ज़ करने वालों की सोच है कि यह दुआ तो ख़ास धर्म की पैरवी है. यह मदरसे की दुआ है. स्टूडेंटों से इसे गवाना देशभक्ति नहीं है. दिलचस्प तो यह है कि यह नज़्म स्कूल की किताबों का हिस्सा हो सकता है लेकिन सभी स्टूडेंट मिलजुलकर उसे बुलंद आवाज़ में नहीं गा सकते हैं. इसे गाने वालों को ख़ास धर्म का होना चाहिए, ऐसा ही कुछ लोग मान रहे हैं.
यानी इस नज़्म को लय में गाने वाले बच्चे-बच्चियाँ हमसे किसी तरह की कोई लम्बी- चौड़ी माँग नहीं करती हैं. इनकी दुआ तो बिल्कुल अलग किस्म की है.
इनकी ख़्वाहिश है, हमारी ज़िंदगी दिये की तरह रोशनी फैलाने वाली हो. दुनिया में छाया अँधेरा दूर करें. हम अँधेरा नहीं, उजाला फैलाने वाली/ वाले बनें.
ये दुआ कर रही/रहे हैं कि उन्हें ऐसा बनने का मौक़ा और हौसला मिले ताकि उनसे देश की इज़्ज़त बढ़े. वतन का नाम बदनाम न हो. वे अपने को फुलवाड़ी में खिले फूल की मानिंद बता रहे हैं. इल्म से उनकी मोहब्बत हो, इसकी दुआ कर रहे हैं.
और तो और, वे यह सब हासिल कर कैसा इंसान बनना चाहती/ चाहते हैं?… तो ये दुआ कर रहे/रही हैं कि हमें हमदर्द बनाना, मददगार बनाना.
मगर किसके लिए? ग़रीबों, दुखियारों, बुज़ुर्गों के लिए...ये सचेत हैं कि कहीं ऐसा न हो भटकाव आ जाए. स्वार्थ हावी हो जाए. तो इनकी प्रार्थना है, हमें बुराई से बचाए रखना.
अगर कहीं ग़लत रास्ते पर क़दम बढ़ें तो हमारे क़दम नेकी के रास्ते पर ले जाना. कुल मिलाकर इनकी दुआ क्या है? यही न कि ये ख़ुद नेक इंसान बनें. देशभक्त बनें. वंचितों के मददगार बनें. समाज के लिए काम आएँ. दुनिया में फैले हर तरह के अँधेरे मिटाएँ.
क्या हम बतौर समाज, इन दुआओं को मासूमों की ज़िंदगी का सच बनाने के लिए कोशिश करनी तो दूर उन पर ग़ौर करने को भी तैयार नहीं हैं?तो हम अपने मासूमों को कैसा बनना चाहते हैं... नफ़रत करने वाला. बुरा. झूठा. गरीबों, बुज़ुर्गों को उनके हाल पर छोड़ देने वाला. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाला?एक और बात. इस नज़्म का नाम है, 'बच्चे की दुआ'. इसे मुसलमान, हिन्दू, सिख, ईसाई या बौद्ध बच्चे-बच्चियों की दुआ नहीं कहा गया है... सभी बच्चे-बच्चियों की दुआ मानी गयी. है न?
तो क्या हम अपनी नयी पीढ़ी को सबके साथ दुआ माँगते नहीं देखना चाहते? या एक-दूसरे की दुआओं में शामिल होते हुए नहीं देखना चाहते?तो क्या हमें 'ख़ुदा' से दुआ पर परहेज़ है? वैसे, जिन्हें ईश्वर में यक़ीन है, उनके लिए ऊपरवाला, ख़ुदा, अल्लाह, गॉड, भगवान सब एक ही निराकार के अलग-अलग ज़बानों में पहचान के शब्द हैं. तब ही तो गाँधी जी का प्रिय भजन यही कहता है,
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