जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष का सिर किसने फोड़ा, एबीवीपी छात्रों के हाथ किसने तोड़े, जेएनयू में लाठी डंडे कैसे आए?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
वो नक़ाबपोश कौन थे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब दिल्ली पुलिस तलाशने की कोशिश करेगी.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
लेकिन दिल्ली पुलिस लगभग चार साल बाद भी ये पता नहीं लगा पाई है कि 9 फरवरी 2016 की शाम जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' नारे किसने लगाए.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
ऐसे में 5 जनवरी की शाम खून ख़राबा करने वाले व्यक्तियों, संगठनों तक कब पहुंच पाएगी, ये वक़्त ही बताएगा.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
बीबीसी ने इस विश्वविद्यालय के छात्रों, छात्रसंघ नेताओं, शिक्षकों और सुरक्षाकर्मियों से बात करके उन बिंदुओं की पड़ताल की है जो 5 जनवरी की शाम हुई हिंसा के लिए ज़मीन तैयार करते हुए दिखते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
शाम लगभग 5 से 7 के बीच अचानक इंटरनेट पर एक तस्वीर और वीडियो वायरल होता है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
इस वीडियो में जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष के सिर से ख़ून बहता हुआ दिखता है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
देखते ही देखते इंटरनेट पर ये वीडियो वायरल हो जाता है और कई पूर्व छात्र, मीडियाकर्मी जेएनयू कैम्पस में दाख़िल होने लगते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
देर शाम तक जेएनयू के दो दर्जन से अधिक छात्र गंभीर चोटों के साथ एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हो जाते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
इसके बाद इंटरनेट पर वो वीडियो प्रसारित होने लगते हैं, जिनमें कुछ नकाबपोश हाथ में लाठियां और धारदार हथियार लिए छात्रों को मारते और भगाते हुए दिख रहे हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
इसके बाद एक वीडियो आता है जिसमें कई नक़ाबपोश हाथों में लाठी-डंडे लिए बिना किसी रोकटोक के यूनिवर्सिटी कैम्पस से बाहर निकल हुए दिखते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर जेएनयू में बाहरी लोग कैसे आए और उन्हें अंदर लेकर कौन आया?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
सवालों के घेरे में जेएनयू प्रशासन
आमतौर पर जेएनयू कैम्पस में बाहरी लोगों का आना आसान नहीं है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
मीडियाकर्मियों तक को जेएनयू में प्रवेश करने से पहले मुख्य द्वार के पास मौजूद सुरक्षाकर्मियों के पास एंट्री करनी होती है. नाम, मोबाइल नंबर, उसका नाम जिससे मिलना होता है आदि एंट्री रजिस्टर में लिखना होता है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
यही नहीं, जिस व्यक्ति से आप मिलने गए हैं, उनकी बात मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से करानी होती है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
सुरक्षाकर्मी पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही किसी भी व्यक्ति को जेएनयू परिसर में जाने की इजाज़त देते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
ऐसे में इतनी चाकचौबंद व्यवस्था होने के बाद भी बाहरी लोग जेएनयू में कैसे घुसे...?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
जेएनयू की सिक्यूरिटी टीम इस समय भारतीय सेना के रिटायर्ड जवानों से लैस है.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
ऐसे में सेना की ट्रेनिंग वाले सुरक्षाकर्मियों के रहते हुए जेएनयू परिसर में लाठी-डंडे कैसे पहुंचे?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
जेएनयू प्रशासन ने अपनी ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में इन सवालों के जवाब नहीं दिए हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
लेकिन जेएनयू वीसी की ओर से 5 जनवरी, 2020 को जारी इस पत्र में ये बताया गया है कि पांच जनवरी को घटी हिंसक घटना के तार बीते पांच दिनों से यूनिवर्सिटी कैम्पस में जेएनयूएसयू और एबीवीपी छात्रों के बीच जारी संघर्ष से जुड़े हुए हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
लेकिन सवाल उठता है कि नए साल के पहले हफ़्ते में ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से जेएनयू में छात्रों के बीच हिंसक झड़पें होना शुरू हुईं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
एबीवीपी और जेएनयूएसयू के बीच हिंसा क्यों हुई?मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
जेएनयू परिसर में साल के पहले हफ़्ते में जो हुआ, उसके तार सीधे-सीधे फीस वृद्धि के लिए हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हुए हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
साल 2019 के आख़िरी महीनों में हॉस्टल फीस वृद्धि को लेकर जेएनयूएसयू और विश्वविद्यालय प्रशासन आमने-सामने था.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और जेएनयूएसयू दोनों फ़ीस बढ़ोत्तरी के ख़िलाफ़ थे.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
लेकिन धीरे-धीरे दोनों गुटों में दरार आती चली गई और आख़िरकार ये दरार 5 जनवरी को हुई हिंसा के रूप में सामने आई.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
एबीवीपी के छात्र नेता मनीष जांगिड़ इसकी वजह बताते हैं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
जांगिड़ कहते हैं, "हम पहले भी फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ थे और अब भी हैं. लेकिन जब तक ये विरोध प्रदर्शन फीस वृद्धि के ख़िलाफ़ था तब तक हम विरोध कर रहे थे. लेकिन जब इन विरोध प्रदर्शनों में नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे मुद्दों का विरोध शामिल हो गया, शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार किया गया. तब हमनें ख़ुद को इससे अलग किया."मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
मनीष जांगिड़ शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की बात करते हुए नवंबर महीने की उस घटना का ज़िक्र करते हैं जब जेएनयू की एसोसिएट डीन वंदना मिश्रा को बंधक बनाए जाने और उनके साथ हाथापाई करने की ख़बरें आई थीं.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
इस घटना के बाद 100 से ज़्यादा शिक्षकों ने जेएनयूटीए से नाता तोड़ते हुए एक नया संगठन बनाया.मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
वंदना मिश्रा के साथ हुए बर्ताव पर जेएनयूएसयू से जुड़ीं छात्र नेता अपेक्षा अपना पक्ष रखते हुए बताती हैं, "28 अक्तूबर को इंटर हॉल एडमिनिस्ट्रेशन मीटिंग बुलाए जाने से पहले ही नए हॉस्टल नियमों को लेकर सर्कुलर जारी किया गया. नए नियमों को लेकर छात्रों से सुझाव मांगे गए और छात्रों ने इन नियमों का विरोध किया. इसके बाद 28 अक्तूबर को इंटर हॉल एडमिनिस्ट्रेशन की मीटिंग में छात्रों के प्रतिनिधियों को बुलाए बिना, नए नियमों को पास कर दिया जाता है."मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
"इसके बाद एग्जिक्यूटिव काउंसिल की मींटिग में तीन सदस्यों की अनुपस्थिति में भी ये नए नियम स्वीकार कर लिए जाते हैं. इन नियमों में फीस वृद्धि एक बड़ा मुद्दा था. एबीवीपी ने शुरुआत में ये दिखाने की कोशिश की कि वे फीस वृद्धि के मुद्दे पर छात्रों के साथ हैं. क्योंकि उनका समर्थन करने वाले छात्रों ने इसकी मांग उठाई थी."मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
"लेकिन जब छात्रों ने वंदना मिश्रा से ये सवाल किया कि वे छात्रों के ख़िलाफ़ जाने वाले ऐसे नियमों को पास क्यों करा रही हैं तो एबीवीपी छात्र उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं. छात्रों के साथ धक्का-मुक्की करते हैं. इस घटना के बाद जगजाहिर हो गया कि एबीवीपी जेएनयू प्रशासन के साथ मिला हुआ है" मुक्त अश्लील सेक्स और अनल सेक्स संग्रह
Friday, March 6, 2020
Tuesday, January 28, 2020
कोरोना वायरसः भारत में सतर्कता, चीन से लौटे लोगों की निगरानी
जानलेवा कोरोना वायरस के चीन और चीन से बाहर संक्रमण होने की ख़बरों के बीच भारत सरकार भी लगातार स्थिति की समीक्षा कर रही है.
सोमवार को दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने किसी भी तरह की स्थिति से निबटने में भारत की तैयारियों की समीक्षा की.
हालाँकि सरकार की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार अभी तक भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का एक भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है.
मगर भारत में अब तक लगभग 450 लोगों को निगरानी में रखा गया है जिनमें अधिकतर लोग केरल में हैं.
इनमें से बहुत सारे लोग हाल ही में चीन से लौटे हैं और उन्होंने एहतियात के तौर पर ख़ुद ही मेडिकल सलाह के लिए संपर्क किया था.
इसके साथ-साथ देश में नेपाल से सटे राज्यों के सीमावर्ती इलाक़ों में भी सतर्कता रखी जा रही है.
नेपाल पहला दक्षिण एशियाई देश है जहाँ कोरोना वायरस के संक्रमणी की पुष्टि हुई है.
नेपाल सरकार ने 24 जनवरी को पुष्टि की थी कि चीन के वायरस प्रभावित वुहान प्रांत से लौटे एक छात्र को वायरस संक्रमण हुआ है.
पीटीआई ने अधिकारियों के हवाले से ख़बर दी है कि पिछले कुछ दिनों में चीन से लौटे कम-से-कम 436 लोगों की निगरानी की जा रही है.
अधिकारियों ने बताया कि अब तक जितने भी लोगों के ख़ून के नमूने पुणे स्थित नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी भेजे गए थे उनमें किसी का भी नमूना पॉज़िटिव नहीं पाया गया.
केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा ने पत्रकारों से कहा कि ज़िला स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ तालमेल के ज़रिए आवश्यक क़दम उठाए जा रहे हैं.
मंत्री ने कहा, "हमने ऐसे वॉर्ड खोले हैं जहाँ लोगों को एकांत में रखा जा रहा है, हालाँकि अभी तक हमारे पास एक भी मामले की पुष्टि की ख़बर नहीं है."
इस बीच केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोरोना वायरस से प्रभावित चीन के वुहान प्रांत में अटके भारतीयों को बाहर निकालने की व्यवस्था करने का आग्रह किया है जिनमें केरल के भी कई लोग हैं.
उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में बताया है कि सरकार को चीन में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के संबंधियों से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक़ वहाँ स्थिति गंभीर है.
विजयन ने इस चिट्ठी में लिखा, "इस बात पर विचार होना चाहिए कि वुहान और उसके पास के हवाई अड्डों पर एक विशेष विमान भेजा जाए जो वहाँ से भारतीयों को वापस लेकर लौटे."
केरल के मुख्यमंत्री इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर को भी दो बार चिट्ठी लिख चुके हैं.
पीटीआई के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त डॉक्टरों की एक टीम ने कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और केएमसी हॉस्पिटल का दौरा किया और तैयारियों पर संतोष जताया.
भारत में चिंता का कारण
पिछले सप्ताह कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर जारी चिंताओं को देखते हुए भारत में भी एडवाइज़री जारी की गई थी.
सरकार ने दिल्ली समेत देश के सात हवाई अड्डों पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की ताकि अगर चीन या हांगकांग से लौटे किसी शख़्स में संक्रमण के असर दिखते हैं तो उसकी तुरंत जांच कराई जा सके.
भारत में नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया कि यह वायरस मर्स और सार्स वायरस की तरह जानवरों से ही आया है. दस से बीस दिनों के भीतर ही यह वायरस 40 से 550 लोगों को संक्रमित कर चुका है. जो वायरस अब तक चीन तक ही सीमित था वो अब 5-6 देशों तक भी पहुंच चुका है.
वो कहते हैं, "यह वायरस अमरीका तक पहुंच चुका है तो हमारे देश के लोग भी चीन की यात्रा करते हैं. क़रीब 1200 मेडिकल स्टूडेंट चीन में पढ़ाई कर रहे हैं, जिसमें से ज़्यादातर वुहान प्रांत में ही हैं. ऐसे में अगर वो वहां से लौटते हैं तो इस वायरस के भारत में आ जाने की आशंका बहुत बढ़ जाती है."
सोमवार को दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने किसी भी तरह की स्थिति से निबटने में भारत की तैयारियों की समीक्षा की.
हालाँकि सरकार की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार अभी तक भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का एक भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है.
मगर भारत में अब तक लगभग 450 लोगों को निगरानी में रखा गया है जिनमें अधिकतर लोग केरल में हैं.
इनमें से बहुत सारे लोग हाल ही में चीन से लौटे हैं और उन्होंने एहतियात के तौर पर ख़ुद ही मेडिकल सलाह के लिए संपर्क किया था.
इसके साथ-साथ देश में नेपाल से सटे राज्यों के सीमावर्ती इलाक़ों में भी सतर्कता रखी जा रही है.
नेपाल पहला दक्षिण एशियाई देश है जहाँ कोरोना वायरस के संक्रमणी की पुष्टि हुई है.
नेपाल सरकार ने 24 जनवरी को पुष्टि की थी कि चीन के वायरस प्रभावित वुहान प्रांत से लौटे एक छात्र को वायरस संक्रमण हुआ है.
पीटीआई ने अधिकारियों के हवाले से ख़बर दी है कि पिछले कुछ दिनों में चीन से लौटे कम-से-कम 436 लोगों की निगरानी की जा रही है.
अधिकारियों ने बताया कि अब तक जितने भी लोगों के ख़ून के नमूने पुणे स्थित नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी भेजे गए थे उनमें किसी का भी नमूना पॉज़िटिव नहीं पाया गया.
केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा ने पत्रकारों से कहा कि ज़िला स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ तालमेल के ज़रिए आवश्यक क़दम उठाए जा रहे हैं.
मंत्री ने कहा, "हमने ऐसे वॉर्ड खोले हैं जहाँ लोगों को एकांत में रखा जा रहा है, हालाँकि अभी तक हमारे पास एक भी मामले की पुष्टि की ख़बर नहीं है."
इस बीच केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोरोना वायरस से प्रभावित चीन के वुहान प्रांत में अटके भारतीयों को बाहर निकालने की व्यवस्था करने का आग्रह किया है जिनमें केरल के भी कई लोग हैं.
उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में बताया है कि सरकार को चीन में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के संबंधियों से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक़ वहाँ स्थिति गंभीर है.
विजयन ने इस चिट्ठी में लिखा, "इस बात पर विचार होना चाहिए कि वुहान और उसके पास के हवाई अड्डों पर एक विशेष विमान भेजा जाए जो वहाँ से भारतीयों को वापस लेकर लौटे."
केरल के मुख्यमंत्री इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर को भी दो बार चिट्ठी लिख चुके हैं.
पीटीआई के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त डॉक्टरों की एक टीम ने कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और केएमसी हॉस्पिटल का दौरा किया और तैयारियों पर संतोष जताया.
भारत में चिंता का कारण
पिछले सप्ताह कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर जारी चिंताओं को देखते हुए भारत में भी एडवाइज़री जारी की गई थी.
सरकार ने दिल्ली समेत देश के सात हवाई अड्डों पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की ताकि अगर चीन या हांगकांग से लौटे किसी शख़्स में संक्रमण के असर दिखते हैं तो उसकी तुरंत जांच कराई जा सके.
भारत में नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया कि यह वायरस मर्स और सार्स वायरस की तरह जानवरों से ही आया है. दस से बीस दिनों के भीतर ही यह वायरस 40 से 550 लोगों को संक्रमित कर चुका है. जो वायरस अब तक चीन तक ही सीमित था वो अब 5-6 देशों तक भी पहुंच चुका है.
वो कहते हैं, "यह वायरस अमरीका तक पहुंच चुका है तो हमारे देश के लोग भी चीन की यात्रा करते हैं. क़रीब 1200 मेडिकल स्टूडेंट चीन में पढ़ाई कर रहे हैं, जिसमें से ज़्यादातर वुहान प्रांत में ही हैं. ऐसे में अगर वो वहां से लौटते हैं तो इस वायरस के भारत में आ जाने की आशंका बहुत बढ़ जाती है."
Thursday, November 7, 2019
إيما واتسون: "أنا سعيدة بكوني عزباء، وأسمي ذلك شريكة نفسي"
قالت الممثلة البريطانية إيما واتسون إنها شعرت "بالتوتر والقلق" حيال بلوغ سن الثلاثين، بسبب ضغوط على حياتها الشخصية.
وتضيف واتسون، التي تحتفل بعيد ميلادها في أبريل/ نيسان، أنها تلقت "سيلا من الرسائل المموهة" حول الأمور التي كان ينبغي عليها تحقيقها عند بلوغها سن الثلاثين.
وقالت واتسون في تصريح لمجلة فوغ البريطانية إن من ضمن ما ذكرته الرسائل "إذا لم يكن لديك زوج ، وإذا لم يكن لديك طفل ...موضحة أن هناك قدر هائل من القلق تمثله هذه الرسائل".
لكن واتسون أضافت أنها سعيدة بمفردها، ووصفت وضعها العاطفي بأنها "شريكة نفسها".
وأشارت نجمه سلسلة أفلام هاري بوتر، إلى أنها لم تؤمن أبدا، في السابق، بفكرة أن تكون سعيدا وأنت أعزب.
وتقول واتسون الناشطة في مجال حقوق المرأة، إن العام الماضي كان "صعباً" بالنسبة لها بسبب هذه المرحلة من حياتها.
وتساءلت "لماذا يثير الجميع ضجة كبيرة حول بلوغ سن الـ 30؟ إنها ليست مسألة مهمة".
وقالت واتسون "بلغت 29 عاما، وعندها قلت "يا إلهي، أشعر بالتوتر والقلق".
وأضافت "أدركت أن ذلك كله بسبب الكم الهائل من الرسائل التي تلقيتها فجأة".
وقالت "إذا لم تبن منزلا، وإذا لم يكن لديكِ زوج، وإذا لم يكن لديكِ طفل، وبلغت من العمر 30 عاما، وأنتِ لست في وضع آمن ومستقر في حياتك المهنية، أو لا تزالين تستكشفين الحياة ...هناك كمية مذهلة من القلق تحمله وتمثله هذه الرسائل".
ستلعب واتسون دور البطولة في فيلم قادم مقتبس عن رواية "نساء صغيرات"، إلى جانب تيموثي شالامي وسويرس رونان وفلورنس بوه.
وكانت واتسون قد عملت مع النجمتين لورا ديرن وميريل ستريب، وقالت إنها استمتعت حقا بالعمل معهما.
وأضافت في تصريحها لمجلة فوغ "كنا نعرف بعضنا قبل أن نعمل في فيلم نساء صغيرات".
وقالت "التقينا في تجمعات الناشطين، لذلك كان لدينا هذا الحماس والتضامن كناشطاتٍ كُنَّ جزءا من حراك معين قبل أن يجمعنا عمل فني واحد لأول مرة".
وإضافة إلى كونها ممثلة، تعمل واتسون كسفيرة للنوايا الحسنة في الأمم المتحدة، وشاركت أيضا في إطلاق حملة "هي فور شي" He For She، التي تناضل من أجل المساواة بين الجنسين في جميع أنحاء العالم.
وقد التقت بـ ملالا يوسفزاي الفائزة بجائزة نوبل للسلام، كجزء من عملها.
وقالت مالالا، بعد اللقاء، إن واتسون كانت السبب وراء تعريفها كناشطة نسوية وأضافت أنها لم تعد مترددة في أن تعرف عن نفسها بتلك الصفة.
وتضيف واتسون، التي تحتفل بعيد ميلادها في أبريل/ نيسان، أنها تلقت "سيلا من الرسائل المموهة" حول الأمور التي كان ينبغي عليها تحقيقها عند بلوغها سن الثلاثين.
وقالت واتسون في تصريح لمجلة فوغ البريطانية إن من ضمن ما ذكرته الرسائل "إذا لم يكن لديك زوج ، وإذا لم يكن لديك طفل ...موضحة أن هناك قدر هائل من القلق تمثله هذه الرسائل".
لكن واتسون أضافت أنها سعيدة بمفردها، ووصفت وضعها العاطفي بأنها "شريكة نفسها".
وأشارت نجمه سلسلة أفلام هاري بوتر، إلى أنها لم تؤمن أبدا، في السابق، بفكرة أن تكون سعيدا وأنت أعزب.
وتقول واتسون الناشطة في مجال حقوق المرأة، إن العام الماضي كان "صعباً" بالنسبة لها بسبب هذه المرحلة من حياتها.
وتساءلت "لماذا يثير الجميع ضجة كبيرة حول بلوغ سن الـ 30؟ إنها ليست مسألة مهمة".
وقالت واتسون "بلغت 29 عاما، وعندها قلت "يا إلهي، أشعر بالتوتر والقلق".
وأضافت "أدركت أن ذلك كله بسبب الكم الهائل من الرسائل التي تلقيتها فجأة".
وقالت "إذا لم تبن منزلا، وإذا لم يكن لديكِ زوج، وإذا لم يكن لديكِ طفل، وبلغت من العمر 30 عاما، وأنتِ لست في وضع آمن ومستقر في حياتك المهنية، أو لا تزالين تستكشفين الحياة ...هناك كمية مذهلة من القلق تحمله وتمثله هذه الرسائل".
ستلعب واتسون دور البطولة في فيلم قادم مقتبس عن رواية "نساء صغيرات"، إلى جانب تيموثي شالامي وسويرس رونان وفلورنس بوه.
وكانت واتسون قد عملت مع النجمتين لورا ديرن وميريل ستريب، وقالت إنها استمتعت حقا بالعمل معهما.
وأضافت في تصريحها لمجلة فوغ "كنا نعرف بعضنا قبل أن نعمل في فيلم نساء صغيرات".
وقالت "التقينا في تجمعات الناشطين، لذلك كان لدينا هذا الحماس والتضامن كناشطاتٍ كُنَّ جزءا من حراك معين قبل أن يجمعنا عمل فني واحد لأول مرة".
وإضافة إلى كونها ممثلة، تعمل واتسون كسفيرة للنوايا الحسنة في الأمم المتحدة، وشاركت أيضا في إطلاق حملة "هي فور شي" He For She، التي تناضل من أجل المساواة بين الجنسين في جميع أنحاء العالم.
وقد التقت بـ ملالا يوسفزاي الفائزة بجائزة نوبل للسلام، كجزء من عملها.
وقالت مالالا، بعد اللقاء، إن واتسون كانت السبب وراء تعريفها كناشطة نسوية وأضافت أنها لم تعد مترددة في أن تعرف عن نفسها بتلك الصفة.
Friday, October 25, 2019
कौन लोग हैं जिन्हें 'बच्चे की दुआ' से दिक़्क़त है?: नज़रिया
कुछ उर्दू/ हिन्दुस्तानी अलफ़ाज़ हों, कहीं ख़ुदा, रब या अल्लाह जैसे शब्द आ जायें और लिखने वाले को इक़बाल कहते हों तो कुछ लोगों के कान खड़े होने के लिए इतना काफ़ी है.
उनके लिए शब्दों के भेद जानना अहम नहीं है. उनके ज़हन में शब्दों से निकलने वाली आवाज़ों की छवियाँ हैं. उन छवियों में कोई धर्म है. उस धर्म की ख़ास छवि है.
वही छवि उनके लिए असल मायने है.
फिर चाहे, हम कितनी भी मानेख़ेज़ बात कहें, लिखें या बोलें, वे उन्हें उन छवियों से ही तौल देते हैं. सिरे से ख़ारिज करने की भरपूर कोशिश करते हैं. इस कोशिश में वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि 'भारत' शब्द से बनने वाली तस्वीर को ही तोड़ने लगते हैं.
अगर हम वाक़ई में देखना चाहते हैं तो हाल के दिनों में ऐसा बहुत कुछ दिख सकता है. ताजा मामला एक नज़्म के सिलसिले में हैं. नज़्म लिखने वाले ने इसे 'बच्चे की दुआ' नाम दिया था. यही दुआ अरसे से भारत के कई हिस्सों में उर्दू और हिन्दी में पढ़ाई जाती है.
अब आपत्ति दर्ज़ करने वालों की सोच है कि यह दुआ तो ख़ास धर्म की पैरवी है. यह मदरसे की दुआ है. स्टूडेंटों से इसे गवाना देशभक्ति नहीं है. दिलचस्प तो यह है कि यह नज़्म स्कूल की किताबों का हिस्सा हो सकता है लेकिन सभी स्टूडेंट मिलजुलकर उसे बुलंद आवाज़ में नहीं गा सकते हैं. इसे गाने वालों को ख़ास धर्म का होना चाहिए, ऐसा ही कुछ लोग मान रहे हैं.
यानी इस नज़्म को लय में गाने वाले बच्चे-बच्चियाँ हमसे किसी तरह की कोई लम्बी- चौड़ी माँग नहीं करती हैं. इनकी दुआ तो बिल्कुल अलग किस्म की है.
इनकी ख़्वाहिश है, हमारी ज़िंदगी दिये की तरह रोशनी फैलाने वाली हो. दुनिया में छाया अँधेरा दूर करें. हम अँधेरा नहीं, उजाला फैलाने वाली/ वाले बनें.
ये दुआ कर रही/रहे हैं कि उन्हें ऐसा बनने का मौक़ा और हौसला मिले ताकि उनसे देश की इज़्ज़त बढ़े. वतन का नाम बदनाम न हो. वे अपने को फुलवाड़ी में खिले फूल की मानिंद बता रहे हैं. इल्म से उनकी मोहब्बत हो, इसकी दुआ कर रहे हैं.
और तो और, वे यह सब हासिल कर कैसा इंसान बनना चाहती/ चाहते हैं?… तो ये दुआ कर रहे/रही हैं कि हमें हमदर्द बनाना, मददगार बनाना.
मगर किसके लिए? ग़रीबों, दुखियारों, बुज़ुर्गों के लिए...ये सचेत हैं कि कहीं ऐसा न हो भटकाव आ जाए. स्वार्थ हावी हो जाए. तो इनकी प्रार्थना है, हमें बुराई से बचाए रखना.
अगर कहीं ग़लत रास्ते पर क़दम बढ़ें तो हमारे क़दम नेकी के रास्ते पर ले जाना. कुल मिलाकर इनकी दुआ क्या है? यही न कि ये ख़ुद नेक इंसान बनें. देशभक्त बनें. वंचितों के मददगार बनें. समाज के लिए काम आएँ. दुनिया में फैले हर तरह के अँधेरे मिटाएँ.
क्या हम बतौर समाज, इन दुआओं को मासूमों की ज़िंदगी का सच बनाने के लिए कोशिश करनी तो दूर उन पर ग़ौर करने को भी तैयार नहीं हैं?तो हम अपने मासूमों को कैसा बनना चाहते हैं... नफ़रत करने वाला. बुरा. झूठा. गरीबों, बुज़ुर्गों को उनके हाल पर छोड़ देने वाला. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाला?एक और बात. इस नज़्म का नाम है, 'बच्चे की दुआ'. इसे मुसलमान, हिन्दू, सिख, ईसाई या बौद्ध बच्चे-बच्चियों की दुआ नहीं कहा गया है... सभी बच्चे-बच्चियों की दुआ मानी गयी. है न?
तो क्या हम अपनी नयी पीढ़ी को सबके साथ दुआ माँगते नहीं देखना चाहते? या एक-दूसरे की दुआओं में शामिल होते हुए नहीं देखना चाहते?तो क्या हमें 'ख़ुदा' से दुआ पर परहेज़ है? वैसे, जिन्हें ईश्वर में यक़ीन है, उनके लिए ऊपरवाला, ख़ुदा, अल्लाह, गॉड, भगवान सब एक ही निराकार के अलग-अलग ज़बानों में पहचान के शब्द हैं. तब ही तो गाँधी जी का प्रिय भजन यही कहता है,
उनके लिए शब्दों के भेद जानना अहम नहीं है. उनके ज़हन में शब्दों से निकलने वाली आवाज़ों की छवियाँ हैं. उन छवियों में कोई धर्म है. उस धर्म की ख़ास छवि है.
वही छवि उनके लिए असल मायने है.
फिर चाहे, हम कितनी भी मानेख़ेज़ बात कहें, लिखें या बोलें, वे उन्हें उन छवियों से ही तौल देते हैं. सिरे से ख़ारिज करने की भरपूर कोशिश करते हैं. इस कोशिश में वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि 'भारत' शब्द से बनने वाली तस्वीर को ही तोड़ने लगते हैं.
अगर हम वाक़ई में देखना चाहते हैं तो हाल के दिनों में ऐसा बहुत कुछ दिख सकता है. ताजा मामला एक नज़्म के सिलसिले में हैं. नज़्म लिखने वाले ने इसे 'बच्चे की दुआ' नाम दिया था. यही दुआ अरसे से भारत के कई हिस्सों में उर्दू और हिन्दी में पढ़ाई जाती है.
अब आपत्ति दर्ज़ करने वालों की सोच है कि यह दुआ तो ख़ास धर्म की पैरवी है. यह मदरसे की दुआ है. स्टूडेंटों से इसे गवाना देशभक्ति नहीं है. दिलचस्प तो यह है कि यह नज़्म स्कूल की किताबों का हिस्सा हो सकता है लेकिन सभी स्टूडेंट मिलजुलकर उसे बुलंद आवाज़ में नहीं गा सकते हैं. इसे गाने वालों को ख़ास धर्म का होना चाहिए, ऐसा ही कुछ लोग मान रहे हैं.
यानी इस नज़्म को लय में गाने वाले बच्चे-बच्चियाँ हमसे किसी तरह की कोई लम्बी- चौड़ी माँग नहीं करती हैं. इनकी दुआ तो बिल्कुल अलग किस्म की है.
इनकी ख़्वाहिश है, हमारी ज़िंदगी दिये की तरह रोशनी फैलाने वाली हो. दुनिया में छाया अँधेरा दूर करें. हम अँधेरा नहीं, उजाला फैलाने वाली/ वाले बनें.
ये दुआ कर रही/रहे हैं कि उन्हें ऐसा बनने का मौक़ा और हौसला मिले ताकि उनसे देश की इज़्ज़त बढ़े. वतन का नाम बदनाम न हो. वे अपने को फुलवाड़ी में खिले फूल की मानिंद बता रहे हैं. इल्म से उनकी मोहब्बत हो, इसकी दुआ कर रहे हैं.
और तो और, वे यह सब हासिल कर कैसा इंसान बनना चाहती/ चाहते हैं?… तो ये दुआ कर रहे/रही हैं कि हमें हमदर्द बनाना, मददगार बनाना.
मगर किसके लिए? ग़रीबों, दुखियारों, बुज़ुर्गों के लिए...ये सचेत हैं कि कहीं ऐसा न हो भटकाव आ जाए. स्वार्थ हावी हो जाए. तो इनकी प्रार्थना है, हमें बुराई से बचाए रखना.
अगर कहीं ग़लत रास्ते पर क़दम बढ़ें तो हमारे क़दम नेकी के रास्ते पर ले जाना. कुल मिलाकर इनकी दुआ क्या है? यही न कि ये ख़ुद नेक इंसान बनें. देशभक्त बनें. वंचितों के मददगार बनें. समाज के लिए काम आएँ. दुनिया में फैले हर तरह के अँधेरे मिटाएँ.
क्या हम बतौर समाज, इन दुआओं को मासूमों की ज़िंदगी का सच बनाने के लिए कोशिश करनी तो दूर उन पर ग़ौर करने को भी तैयार नहीं हैं?तो हम अपने मासूमों को कैसा बनना चाहते हैं... नफ़रत करने वाला. बुरा. झूठा. गरीबों, बुज़ुर्गों को उनके हाल पर छोड़ देने वाला. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाला?एक और बात. इस नज़्म का नाम है, 'बच्चे की दुआ'. इसे मुसलमान, हिन्दू, सिख, ईसाई या बौद्ध बच्चे-बच्चियों की दुआ नहीं कहा गया है... सभी बच्चे-बच्चियों की दुआ मानी गयी. है न?
तो क्या हम अपनी नयी पीढ़ी को सबके साथ दुआ माँगते नहीं देखना चाहते? या एक-दूसरे की दुआओं में शामिल होते हुए नहीं देखना चाहते?तो क्या हमें 'ख़ुदा' से दुआ पर परहेज़ है? वैसे, जिन्हें ईश्वर में यक़ीन है, उनके लिए ऊपरवाला, ख़ुदा, अल्लाह, गॉड, भगवान सब एक ही निराकार के अलग-अलग ज़बानों में पहचान के शब्द हैं. तब ही तो गाँधी जी का प्रिय भजन यही कहता है,
مظاهرات لبنان: الاحتجاجات تدخل أسبوعها الثاني والرئيس يتعهد بمحاسبة الفاسدين
دخلت التظاهرات في لبنان أسبوعها الثاني اليوم الخميس، وخرج محتجون إلى الشوارع يطالبون بإسقاط الحكومة ومحاسبة "الفاسدين"، على حد قولهم.
وأقام متظاهرون حواجز على طرق، حول العاصمة بيروت صباح اليوم الخميس، وأغلقوا طريقا رئيسيا يربط بين شرق العاصمة وغربها، ونصبوا خياما في وسط الطريق.
وقال الرئيس اللبناني، ميشال عون، إن كل من يثبت أنهم اختلسوا أموالا عامة سيخضعون للمحاسبة، وذلك في أول خطاب له منذ اندلاع الاحتجاجات الشعبية، قبل أكثر من أسبوع.
وأضاف عون أن مكافحة الفساد تتطلب قوانين صارمة، وليس مجرد كلمات، معتبرا خطة الإصلاح التي اقترحها رئيس الوزراء، سعد الحريري، مؤخراً بمثابة الخطوة الأولى نحو إنقاذ لبنان.
ودخلت التظاهرات المناوئة للحكومة أسبوعها الثاني اليوم، واستمر المحتجون في إغلاق طرق رئيسية، في العاصمة بيروت وغيرها من مناطق في لبنان.
واندلعت التظاهرات احتجاجا على سوء الأوضاع المعيشية والاقتصادية للمواطنين، وكذلك فساد المسؤولين الحكوميين.
لكن الرئيس اللبناني قال إنه لا يمكن إسقاط الحكومة عبر التظاهرات، لكن "التغيير يتم من خلال المؤسسات الدستورية".
وأعرب عون عن استعداده للحوار مع المحتجين، للوصول إلى أفضل الحلول لإنقاذ البلاد من الانهيار المالي، مضيفا: "صار من الضروري إعادة النظر في الواقع الحكومي الحالي".
ودعا عون المحتجين إلى فتح الطرق التي يقطعونها، وقال إن "حرية التعبير حق محترم ومحفوظ، لكن التنقل حق لكل المواطنين أيضا".
في غضون ذلك، رحب رئيس الوزراء سعد الحريري بدعوة الرئيس عون لإعادة النظر في الواقع الحكومي الحالي "من خلال الآليات الدستورية المعمول بها".
وقال الزعيم الدرزي اللبناني، وليد جنبلاط، إن أفضل حل لإنهاء الاحتجاجات الشعبية، التي أثارتها الأزمة الاقتصادية في البلاد، هو الإسراع بتعديل حكومي، و"الدعوة لاحقا إلى انتخابات نيابية، وفق قانون عصري لا طائفي".
ويندد المتظاهرون اللبنانيون بانتشار الفساد في مؤسسات الدولة، وبين قياداتها من مختلف الطوائف وفي المناصب المختلفة، إذ يأتي لبنان ضمن الدول المتصدرة للمؤشرات الدولية للفساد.
وأقر مجلس الوزراء اللبناني مؤخرا حزمة من الإصلاحات الاقتصادية، لنزع فتيل الأزمة ومحاولة تهدئة أكبر احتجاجات تشهدها البلاد منذ سنوات.
وتضمنت الإصلاحات إلغاء الضرائب الجديدة، وخفض رواتب كبار المسؤولين إلى النصف، الأمر الذي يبدو أنه لم يقنع المحتجين.
وأقام متظاهرون حواجز على طرق، حول العاصمة بيروت صباح اليوم الخميس، وأغلقوا طريقا رئيسيا يربط بين شرق العاصمة وغربها، ونصبوا خياما في وسط الطريق.
وقال الرئيس اللبناني، ميشال عون، إن كل من يثبت أنهم اختلسوا أموالا عامة سيخضعون للمحاسبة، وذلك في أول خطاب له منذ اندلاع الاحتجاجات الشعبية، قبل أكثر من أسبوع.
وأضاف عون أن مكافحة الفساد تتطلب قوانين صارمة، وليس مجرد كلمات، معتبرا خطة الإصلاح التي اقترحها رئيس الوزراء، سعد الحريري، مؤخراً بمثابة الخطوة الأولى نحو إنقاذ لبنان.
ودخلت التظاهرات المناوئة للحكومة أسبوعها الثاني اليوم، واستمر المحتجون في إغلاق طرق رئيسية، في العاصمة بيروت وغيرها من مناطق في لبنان.
واندلعت التظاهرات احتجاجا على سوء الأوضاع المعيشية والاقتصادية للمواطنين، وكذلك فساد المسؤولين الحكوميين.
لكن الرئيس اللبناني قال إنه لا يمكن إسقاط الحكومة عبر التظاهرات، لكن "التغيير يتم من خلال المؤسسات الدستورية".
وأعرب عون عن استعداده للحوار مع المحتجين، للوصول إلى أفضل الحلول لإنقاذ البلاد من الانهيار المالي، مضيفا: "صار من الضروري إعادة النظر في الواقع الحكومي الحالي".
ودعا عون المحتجين إلى فتح الطرق التي يقطعونها، وقال إن "حرية التعبير حق محترم ومحفوظ، لكن التنقل حق لكل المواطنين أيضا".
في غضون ذلك، رحب رئيس الوزراء سعد الحريري بدعوة الرئيس عون لإعادة النظر في الواقع الحكومي الحالي "من خلال الآليات الدستورية المعمول بها".
وقال الزعيم الدرزي اللبناني، وليد جنبلاط، إن أفضل حل لإنهاء الاحتجاجات الشعبية، التي أثارتها الأزمة الاقتصادية في البلاد، هو الإسراع بتعديل حكومي، و"الدعوة لاحقا إلى انتخابات نيابية، وفق قانون عصري لا طائفي".
ويندد المتظاهرون اللبنانيون بانتشار الفساد في مؤسسات الدولة، وبين قياداتها من مختلف الطوائف وفي المناصب المختلفة، إذ يأتي لبنان ضمن الدول المتصدرة للمؤشرات الدولية للفساد.
وأقر مجلس الوزراء اللبناني مؤخرا حزمة من الإصلاحات الاقتصادية، لنزع فتيل الأزمة ومحاولة تهدئة أكبر احتجاجات تشهدها البلاد منذ سنوات.
وتضمنت الإصلاحات إلغاء الضرائب الجديدة، وخفض رواتب كبار المسؤولين إلى النصف، الأمر الذي يبدو أنه لم يقنع المحتجين.
Tuesday, October 8, 2019
Утечка данных клиентов Сбербанка. Что известно на данный момент
Сотрудник Сбербанка продал в даркнете данные 5 тысяч клиентов, а не 200, следует из заявления кредитной организации. СМИ ранее сообщали, что скандал с утечкой данных карт может затронуть миллионы человек.
В ходе внутреннего расследования в Сбербанке выяснилось, что сотрудник, похитивший данные карт, "продал несколькими траншами одной из преступных групп в теневом интернете [даркнете] в совокупности 5 тысяч учетных записей кредитных карт Уральского банка Сбербанка, значительное количество из которых являются устаревшими и неактивными", сообщили вечером в понедельник в кредитной организации.
Как пишут "Ведомости", утром в понедельник в интернет попала новая порция конфиденциальной информации - как минимум о 2 тысячах держателей карт крупнейшего банка России.
На одном из форумов в даркнете была выложена таблица на 1999 строк, в которой содержатся ФИО, паспортные данные, номер карты и счета, лимит по карте, срок действия, место работы и жительства и другие данные. Однако CVV/СVC-кодов, кодовых слов и пин-кодов карт в таблице не было, отмечало издание.
В прошлый четверг Сбербанк сообщил о возможной утечке данных кредитных карт, которая затрагивает как минимум 200 клиентов банка. Речь шла об утечке данных только по кредитным картам, ни одной мошеннической операции по картам зафиксировано не было, карты были перевыпущены, говорилось в сообщении банка.
Позже глава Сбербанка Герман Греф сообщил, что сотрудник, ответственный за утечку данных карт, установлен. По его словам, он объяснил свои действия личными причинами.
"Никакой утечки данных, кроме 200 владельцев карт, которые опять-таки не были опубликованы в открытом доступе - они находятся у нас, и еще в трех источниках, которые мы контролируем. Но все эти карты были перевыпущены, владельцам волноваться нечего", - говорил Греф каналу "Россия 1". По его словам, сотруднику грозит уголовная ответственность.
На прошлой неделе газета "Коммерсант" сообщила, что на специализированном форуме, заблокированном Роскомнадзором, появилось объявление о продаже "свежей базы крупного банка".
Продавец утверждал, что он реализует данные о более 60 млн кредитных карт. Сбербанк в четверг заявлял, что проверяет информацию о возможной утечке данных 60 млн клиентов, но считает ее некорректной, так как банком всего было выпущено 40 млн кредитных карт, а активных из них сейчас только 18 млн.
Потенциальным покупателям базы предлагался для ознакомления пробный фрагмент из 200 строк. Журналисты "Коммерсанта", проверяя данные, смогли получить информацию о собственных картах.
Источники издания сходились во мнении, что утечка произошла изнутри Сбербанка, а не в результате подкупа или хакерской атаки. Заявление Сбербанка укрепило эту версию.
После новой утечки в понедельник, в которой фигурировали 2 тысячи держателей карт Сбербанка, корреспонденты "Ведомостей" обзвонили нескольких указанных в таблице людей, и те подтвердили, что являются клиентами банка и держателями указанных в таблице кредитных карт. Некоторым из них уже звонили мошенники и пытались выманить CVV/CVC-код, который, как и пин-коды или кодовые слова, по банковской технике безопасности никогда и никому нельзя сообщать по телефону, пишет издание.
В ходе внутреннего расследования в Сбербанке выяснилось, что сотрудник, похитивший данные карт, "продал несколькими траншами одной из преступных групп в теневом интернете [даркнете] в совокупности 5 тысяч учетных записей кредитных карт Уральского банка Сбербанка, значительное количество из которых являются устаревшими и неактивными", сообщили вечером в понедельник в кредитной организации.
Как пишут "Ведомости", утром в понедельник в интернет попала новая порция конфиденциальной информации - как минимум о 2 тысячах держателей карт крупнейшего банка России.
На одном из форумов в даркнете была выложена таблица на 1999 строк, в которой содержатся ФИО, паспортные данные, номер карты и счета, лимит по карте, срок действия, место работы и жительства и другие данные. Однако CVV/СVC-кодов, кодовых слов и пин-кодов карт в таблице не было, отмечало издание.
В прошлый четверг Сбербанк сообщил о возможной утечке данных кредитных карт, которая затрагивает как минимум 200 клиентов банка. Речь шла об утечке данных только по кредитным картам, ни одной мошеннической операции по картам зафиксировано не было, карты были перевыпущены, говорилось в сообщении банка.
Позже глава Сбербанка Герман Греф сообщил, что сотрудник, ответственный за утечку данных карт, установлен. По его словам, он объяснил свои действия личными причинами.
"Никакой утечки данных, кроме 200 владельцев карт, которые опять-таки не были опубликованы в открытом доступе - они находятся у нас, и еще в трех источниках, которые мы контролируем. Но все эти карты были перевыпущены, владельцам волноваться нечего", - говорил Греф каналу "Россия 1". По его словам, сотруднику грозит уголовная ответственность.
На прошлой неделе газета "Коммерсант" сообщила, что на специализированном форуме, заблокированном Роскомнадзором, появилось объявление о продаже "свежей базы крупного банка".
Продавец утверждал, что он реализует данные о более 60 млн кредитных карт. Сбербанк в четверг заявлял, что проверяет информацию о возможной утечке данных 60 млн клиентов, но считает ее некорректной, так как банком всего было выпущено 40 млн кредитных карт, а активных из них сейчас только 18 млн.
Потенциальным покупателям базы предлагался для ознакомления пробный фрагмент из 200 строк. Журналисты "Коммерсанта", проверяя данные, смогли получить информацию о собственных картах.
Источники издания сходились во мнении, что утечка произошла изнутри Сбербанка, а не в результате подкупа или хакерской атаки. Заявление Сбербанка укрепило эту версию.
После новой утечки в понедельник, в которой фигурировали 2 тысячи держателей карт Сбербанка, корреспонденты "Ведомостей" обзвонили нескольких указанных в таблице людей, и те подтвердили, что являются клиентами банка и держателями указанных в таблице кредитных карт. Некоторым из них уже звонили мошенники и пытались выманить CVV/CVC-код, который, как и пин-коды или кодовые слова, по банковской технике безопасности никогда и никому нельзя сообщать по телефону, пишет издание.
Wednesday, September 18, 2019
Сергей Шишкин: "На войне штабов в Иркутске пал избиратель"
Всего неделю назад завершились выборы в Иркутской области и Иркутске. Иркутянам еще предстоит осмыслить их итоги и сделать выводы. Тем более, что впереди выборы мэра и «сюжет-2020» – выборы губернатора. «МК Байкал» обратился к профессору юридического института госуниверситета Сергею Шишкину с вопросом о том, как он видит итоги муниципальных выборов и что, по его мнению, за ними последует.
– Сергей Иванович, вы – человек, глубоко укорененный в иркутскую политику и как профессиональный правовед, и как специалист по избирательным технологиям. Ваш сорокалетний опыт в этой области тому доказательство, первые демократические выборы в Иркутской области в 90-е годы проходили с вашим участием. Выборы в городскую думу Иркутска в 2019 году были особенными. Как вы оцениваете сам процесс избирательной кампании в городе и каковы предварительные итоги этих выборов?
– Выборы в городе Иркутске в известной степени были и обыкновенные, и необыкновенные. Обыкновенные они в том, что явка была низкой. Если помните, пять лет назад это было 18,3%, сейчас – 26,4%. Сказать, что явка подросла, мы не можем: такой безудержно активный подвоз деклассированных элементов, голосование за деньги вряд ли добавляют процента к волеизъявлению горожан. Если мы отнимем тех, кто просто продал свой голос, не имея никакого интереса к городским делам, к развитию Иркутска, то, наверное, цифра будет примерно такая же, как и пять лет назад. И это меня печалит, потому что когда абсентеизм (неучастие в выборах) в городе доходит до 80% – это, конечно, то, над чем надо задуматься.
С другой стороны, выборы в Иркутске были необычными, их нельзя назвать спокойными, кислыми, скучными. Я определяю эту избирательную кампанию как достаточно воинственный электоральный цикл. На одной из встреч в нашем экспертном клубе мы этот цикл определили как войну штабов. Но в этой войне штабов мы потеряли избирателя. Избирателя не было в фокусе электорального интереса кандидатов.
Почему кандидаты не задумывались над содержательной повесткой дня, не предлагали тренды развития города, его обустройства, какие-то практические вещи, связанные с увеличением бюджета? Прагматизма мы не увидели. Потому что агрессивная стилистика была навязана. Я назвал этот феномен «иркутской Кущевкой». Никогда прежде на округах такого не было: там стреляли, били людей, срывали плакаты. В ходе кампании использовали весь арсенал административного давления, кандидатов не пускали на встречи в школы. Линейка недозволенных средств борьбы была максимальной, и в этом смысле выборы были необычные.
– Сергей Иванович, вы – человек, глубоко укорененный в иркутскую политику и как профессиональный правовед, и как специалист по избирательным технологиям. Ваш сорокалетний опыт в этой области тому доказательство, первые демократические выборы в Иркутской области в 90-е годы проходили с вашим участием. Выборы в городскую думу Иркутска в 2019 году были особенными. Как вы оцениваете сам процесс избирательной кампании в городе и каковы предварительные итоги этих выборов?
– Выборы в городе Иркутске в известной степени были и обыкновенные, и необыкновенные. Обыкновенные они в том, что явка была низкой. Если помните, пять лет назад это было 18,3%, сейчас – 26,4%. Сказать, что явка подросла, мы не можем: такой безудержно активный подвоз деклассированных элементов, голосование за деньги вряд ли добавляют процента к волеизъявлению горожан. Если мы отнимем тех, кто просто продал свой голос, не имея никакого интереса к городским делам, к развитию Иркутска, то, наверное, цифра будет примерно такая же, как и пять лет назад. И это меня печалит, потому что когда абсентеизм (неучастие в выборах) в городе доходит до 80% – это, конечно, то, над чем надо задуматься.
С другой стороны, выборы в Иркутске были необычными, их нельзя назвать спокойными, кислыми, скучными. Я определяю эту избирательную кампанию как достаточно воинственный электоральный цикл. На одной из встреч в нашем экспертном клубе мы этот цикл определили как войну штабов. Но в этой войне штабов мы потеряли избирателя. Избирателя не было в фокусе электорального интереса кандидатов.
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